आँसू खत्म होने पर ? कृष्णभूषण बल कभी कभी भावुकता से छलकते थे कभी कभी विरह और व्यथा में भी रिसते थे एकांत के दोस्त जैसे थे आँसू आँखभर पता नहीं चला कब खत्म हो गए अब तो सूनी आँखें जलने को तैयार हैं अब तो उन्हीं आँखों से हाहाकार उबलकर बह रहा है अब तो उन्हीं आँखों से खून के छिंटे टपकने के लिए तैयार हैं स्वयंभू की आँखें, होशियार !! हारना न जाननेवाले मनुष्यों के स्वाभाविक स्वभाव ऐसे आँखों में न उतरे तो आँसू सुख चुके आँखों से ऐसे उत्पात होने लगे तो कहीं एक दिन आँखें न उड़ जाएँ कहीं एक दिन देश न बह जाए। *** नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी काला आदमी --अमोद भट्टराई एक रंगीन पर फटा पुराना कपड़ा हिलाकर वह हमें रोकने की कोशिश कर रही थी। मेरा ड्राइभर उस कपड़े को और रास्ता भूले लोग जैसे छटपटाती उस 20-22 की युवती को नजरअंदाज करते हुए आगे बड़ गया। तुरंत उसने कुछ सोचा होगा मेरे चेहरे को एकबार देखकर फिर आगे की तरफ देखते हुए उसने कहा-"इधर लोगों को क्या हुआ है ? क्यों सब के सब गाड़ी रोकना चाहते हैं ? ऐसे तो 10 घंटे का रास्ता 15 घंटे में भी नहीं काट सकते.....।" पर पिछले आठ महिने से मैं इस इलाके में रह रहा था और इस दौरान ऐसी घटना मेरे लिए पहली बार घटी थी। मैंने अपने सीट से थोड़ा सरककर और गर्दन थोड़ा मोड़कर पीछे की तरफ देखा। वह अभी भी कपड़ा हिला रही थी और गाड़ी के पीछे दौड़ रही थी। अब मैंने पूरे शरीर को घुमाकर उसे देखा। कच्चे रास्ते में धूल की कमी नहीं थी। उसी धूल को फककर वातावरण धूमिल करने के लिए हमारी गाड़ी के चार पहिए आपाधापी कर रहे थे। मैं उस युवती के चीत्कार तो नहीं सुन सकता था पर मुझे लगा कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है। मैंने ड्राईवर से गाड़ी झट रोकने के लिए तो नहीं कहा पर धीरे से अपना दायाँ हाथ उसके कंधे पर रख दिया। पता नहीं उसने क्या समझा, गाड़ी को धीमी कर धीरे से रोक दिया और मेरी ही तरह आइने से पीछे देखने लगा। जब हमारी गाड़ी रूकी तो उस युवती ने उस कपड़े को अपने शिर पर बाँधा और हमारी गाड़ी की तरफ दौड़ी चली आई। उस वक़्त तक मैं और ड्राईवर अपनी अपनी पूर्वावस्था में आ चुके थे। वह युवती सुंदर थी। पर उस वक्त मुझे वह किसी हार से टूटे हुए मोती की तरह लग रही थी। मैंने आगे का ग्लास सरका कर पूछा - "क्या हुआ ?" मेरे मुँह से शब्द छुटते ही उसने लाल चेहरे से कहा- "भैया मेरी मदद करें। आज फिर विस्फोट हुआ, मेरा शौहर जख्मी है, समय पर हस्पताल नहीं पहुँचाया गया तो मर जाएगा। कृपया मेरी मदद करें।" मैं यहाँ के लोगों में दूसरे विश्वयुद्ध बाद आए सामाजिक परिवर्तन के विषय में अनुसंधान में आए शोधार्थी का सहायक बनकर आया था और फिर अपने लोगों से बातचीत के अलावा पत्र व्यवहार हुए भी महीनों हुए थे, ऐसे वक़्त मे उस युवती के भावनात्मक सम्बोधन 'भैया !' ने मुझे सहसा पिघला दिया। मैं जल्दी से दरवाजा खोलकर बाहर निकल आया। "कहाँ है तुम्हारा पति ? फिर हस्पताल पहुँचने में तो और सात-आठ घंटे लग जाएँगे।" मैंने कहा। "जितने भी लग जाएँ, कृपया मेरी मदद करें। इस रास्ते में गाड़ी अब कितने दिनों बाद दौड़ेगी मैं कह नहीं सकती .....कृपया मेरे शौहर की जान बचाएँ।" वह रूवांसी होकर दो हाथ जोड़े हमसे बिनती कर रही थी। "ठीक है, बैठो गाड़ी में ..... पहले तुम्हारे शौहर को गाड़ी में ले लें और फिर हस्पताल चलेंगे।" मैंने कहा और सस्नेह उसका शिर सहलाया। मेरे इस निर्णय पर सहसा वह भावविभोर हो रोने लगी। मैंने धीरे से उसकी बाँह पकड़कर गाड़ी में बिठाया। और सच ! मुझे लगा, स्नेह की भाषा पढ़कर भावनाएँ बाढ़ बनकर आंखों के जरिए बाहर आ गईं हैं। वहाँ से हटकर उसी के इसारे को नापते हुए हम मूल रास्ता छोड़कर करीब पाँच किलोमीटर भीतर की किसी निर्जन स्थान की तरफ चल दिए । गाड़ी में ही वह मुझे उसके शौहर के घायल होने वाकया दे चुकी थी। वह लकड़ी लेने और शिकार के लिए जंगल में गया था तभी बारूदी सुरंग विस्फोट हो गई थी और वह घायल हो गया था। पिछले हप्ते ऐसे ही सुरंग के फटने पर 15 लोग एक ही जगह ढेर हो गए थे। इसबार उसके पति की जान बची थी, इसलिए वह संतोष प्रकट कर रही थी। पाँच किलोमीटर का उबड़-खाबड़ रास्ता तय करने के लिए हमें तकरीबन एक घंटे लग गए। गाड़ी थमने पर मैंने उसका नाम पूछा- "श्रीमान् मुझे च्यांटिनी कह सकते हैं।" मैं थोड़ी देर के लिए चौंक गया। कम्बोडिया के इस निर्जन स्थान पर भी अपने देश के गांवघर जैसे ही नाम ! अपने भाईबहनों के नाम ! गाड़ी से उतरकर वह झोंपड़े की तरफ बढ़ी। मैंने जो देखा वह मेरे सोच के बिलकुल विपरीत था। मैं तो वहाँ संवेदनाओं के स्वर मितली करनेवाले लोगों की भीड़ की आस लगाए बैठा था। पर वहाँ कोई नहीं था। मैंने देखा झोंपड़े के बाहर एक आदमी लट्ठे की तरह जमीन पर पड़ा हुआ है। कुछ देर के लिए मेरे होश ठिकाने नहीं रहे....उस दृश्य को सादृश्य करने में मुझे कुछ देर लगे। उसके दोनों पैर गायब थे। फिर गौर से देखा, उसका एक हाथ भी नहीं था। हाथ और पैर जहाँ से छिन गए थे वहाँ से मांस के लोथड़े लटक रहे थे। खून भी जम कर थक्के में परिणत हो गया था। मेरी आँखें अनजाने में ही कुछ देर के लिए मूंद गईं। पर भगवान का नाम ले नहीं सका। च्यांटिनी का पति पीड़ा से कराह नहीं रहा था, न ही तड़प रहा था। मैं आश्चर्यचकित होकर खुद से सवाल कर बैठा- आदमी ऐसे भी जी सकता है ? पीड़ा झेलते झेलते वह शायद आदी हो गया था। शायद मेरे सवाल के जवाब में कभीकभी पलकें हिला रहा था। "बारूदी सुरंग के विवेकहीन प्रयोग से हम गरीब ही क्यों कष्ट झेलने को बाध्य हैं श्रीमान् ?" लगा च्यांटिनी का पति मुझे मौन सवाल कर रहा हो। मैं फिर चौंक गया। 'सच ! सुरंग विस्फोट कराकर जो महामानव बनना चाहते हैं, क्या वे इस निर्दोष चेहरे के मौन सवालों का जबाव दे सकते हैं ? क्या यह अब जीवन मूल्य का बोध कर पाएगा ? क्या यह फिर से पूर्ण मानव हो पाएगा ?' मैं खुद पर सवालों का बौछार कर रहा था। "श्रीमान् ! आप कहाँ खो गए ?" च्यांटिनी की आवाज सुनकर मैं फिर चौंक गया। "अब उसे गाड़ी में रखें श्रीमान्, कृपया मेरी मदद करें।" उसने अपने पति का शिर उठाते हुए कहा। "यहाँ गाँववाले नहीं हैं, च्यांटिनी ?" मैंने आश्चर्य व्यक्त किया। "श्रीमान्, पहले यहाँ गाँववाले थे, पर वे मेरे पति को यहाँ पहुँचाकर चल दिए। वे इधर ही बैठे रहे तो उनके घर के चुल्हे कैसे जलेंगे ?" च्यांटिनी ने साफ और निश्चल जवाब दिया। "यहाँ के लोगों में शायद मानवता नाम की कोई चीज बाकी नहीं रही।" शायद मैंने वो बात कह दी जो नहीं कहनी चाहिए थी। च्यांटिनी का चेहरा नीला पड़ गया । वह बोली- "श्रीमान्, मानवता तो उनमें नहीं है जो साफ कमीज पहनकर हम जैसे निर्दोष लोगों को बलि का बकरा बनाते हैं। अपने पाप कर्म दूसरे के शिर मढ़ना मनाही नहीं है, इसलिए पाप किए चले जाते हैं।" "विश्वास में सबकुछ है, पर बहस में कुछ नहीं। जाने दो, श्रीमान् से बहस मत करो च्यांटिनी..... बल्कि मुझे हस्पताल जल्दी पहुँचाओ।" क्षत्-विक्षत् शरीर लिए मौत के दरवाजे पर खड़े च्यांटिनी के पति ने पीड़ाभरी ओजस्वी आवाज में कहा तो हम सब संयमित हो गए। तुरंत मुझे ऐसा लगा जिस तरह दाँतो के बीच पड़े जीभ को दाँतों द्वारा काटे जाने से बचाने के लिए कुशलता पूर्वक चलाना जरूरी है, उसी तरह मुझे अपने अफसरी अंदाज से नीचे उतरकर ठीक से बोलचाल करने के लिए च्यांटिनी का पति मुझे समझा रहा हो। .....उसको उठाने के लिए मैं धीरे से आगे बढ़ा। मेरे साथ ड्राइवर भी आ गया था। हम तीनों ने मिलकर उसे उठाया और गाड़ी के पिछले खंड में होशियारी से रखा। च्यांटिनी पिछे बैठ गई पति के साथ। हमें हस्पताल पहुँचने में आठ-नौ किलोमिटर का काला रास्ता तय करना था !! ³³³ नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
Friday, August 14, 2009
अंक चौबीस से
Posted by कुमुद अधिकारी at 10:02 PM
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