परिवेश ? नारायण तिवारी मैं कहीं से आ रहा था। रास्ते में सौ मैंने उसके पास जाकर पूछा- "आपका कुछ खोया है क्या ?" मेरे चेहरे पर एक नज़र फेंक वह फिर नीचे देखने लगा पर बोला कुछ नहीं। मैंने उसे सौ का नोट देते हुए कहा - "क्या आप यही ढूँढ़ रहे हैं ?" वह चौंका। फिर निराश हो गया और चलने को उद्दत हुआ। मैंने उसे रोककर नोट देते हुए कहा -"सुनिए, इसे लेकर जाएँ।" उसने मेरे हाथ से नोट लेकर अपनी जेब में रख लिया और मेरे चेहरे पर नज़र गढ़ाकर कहा - "आप तो निरे मूर्ख निकले।" मैं तो उससे शुक्रिया अदायगी की आस लगाए बैठा था। ³³³ मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी। हाइकु ? केशव बरूवाल 'पथिक' १ उतरा सूरज कटोरेभर पानी में प्यास मिटाने। २ बलात्कृत हुआ तुम्हारें अंग में वस्त्र आधुनिकता से। ३ शब्दों के वृक्ष में बिंब चूसता, उड़ता भँवरा कवि। ४ शिल्पी पवन बनाता चित्र गगन में मेघ के टुकड़ों से। ५ अनंत यात्रा सागर की लहरों की माझी साथ में। ««« नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
रूपये का नोट पड़ा मिला। नोट उठाया और देखा कहीं कोई देख तो नहीं रहा। किसने गिराया होगा यह नोट ? सोचा, थोड़ी देर ठहर लूँ। शायद कोई आ जाए। ... इसलिए नज़दीकी चाय की दुकान पर जाकर इंतजार करने लगा। मेरी नज़र उसी जगह जमी रही। कुछ देर बाद एक आदमी नज़रें नीची किए उसी जगह पर आ पहुँचा। वह कुछ ढूँढ़ रहा था। मैंने सोचा, अवश्य ही यह नोट उसी आदमी का होगा।
Tuesday, November 4, 2008
अंक सत्रह से
Posted by कुमुद अधिकारी at 7:48 PM
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1 comments:
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