Friday, September 5, 2008

अंक पन्द्रह से

मौत

? ज्योति जंगल


 

उसके बाद

जिंदगी के कठघरे में हूँ

नजाने क्यों

हर मर्द की आँखों में

सिर्फ सवाल पढ़ती रहती हूँ।


 

रंग भी डसने लगे हैं अब,

कभी होंठ

कभी ललाट

कभी मांग

क्यों डसते हैं सर्वांग ?


 

देखती हूँ

सिर्फ देख सकती हूँ मर्दों को

कायर हो गया है मन

कह नहीं सकती

बोल नहीं सकती


 

क्यों खड़ी करते हैं लोग मुझे

विशिष्ट घेरे में ?

क्यों पढ़ते रहते हैं मुझे ?

चुप हैं, पर पूछते रहते हैं हरदम

हमदर्दी भी चूभोते रहते हैं हरदम


 

नाम उसीका है,

सहारा उसीका है

लेकिन वह नहीं है

हे वैधव्य मुझे बता

कौन मर गया

वह ?

या मैं ?

«««

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी


 

आदमी

? श्री ओम श्रेष्ठ 'रोदन'


 

अस्पताल में एक युवक की लाश को शिनाख़्त नहीं किया जा सका। लाश का हुलिया हर तरह के मीडिया में सार्वजनिक किया गया।

बहुत से माँ-बाप आए जिनके बेटे गुम हो गए थे। सब के बस रो रहे थे, मातम मना रहे थे। "हाय बेटा... घर से क्यों भागे तुम...?" "हम तुम्हारी हर बात मानते... बेटा.. लौट आओ।" "तुम ऐसे निकलोगे, ऐसा कभी सोचा नहीं था..हाय मेरा बेटा..!" "कितने सपने संजोए थे...तुम्हें पढ़ाएँगे, बड़ा आदमी बनाएँगे, तुम्हारी शादी कर देंगे..." "चलो बेटा, उसी लड़की से शादी कर लो. अब उठो मेरे लाल..।"

लावारिश लाश को अपने बेटे की लाश मानकर अपनाने वाले माँओं और बापुओं की भीड़ जमा हो गई।

इतने में अस्पताल का एक कर्मचारी आया और हर माँ-बाप को लाश का चेहरा दिखाने लगा।

रोते हुए माँ-बाप लाश का चेहरा देखते और हँसते हुए चले जाते। जो बाक़ी थे वे और डर जाते.... क्रम जारी रहा।

अंत में कोई माँ-बाप नहीं बचे। युवक का लाश फिर लावारिश बन गया।

³³³


 

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी

1 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत हृदय स्पर्शी प्रस्तुति है. आभार.