Friday, August 1, 2008

अंक चौदह से

कैसे कहूँ ?


 


? समुन्द्रा शर्मा


 

काँच की चूड़ियाँ तो

पलभर में टूट जाएँगी

कैसे कहूँ मैं इन चूड़ियों में

तुम्हारा जीवन जुड़ा हुआ है !


 

मांग का लाल सिंदूर

हर सुबह मैं खुद लगाती हूँ

फिर कैसे कहूँ मैं सिंदूर में

तुम्हारा जीवन है !


 

हर धुलाई में

फिकी पड़ने वाली

लाल साड़ी से

कैसे जोड़ूँ मेरे-तुम्हारे प्यार का रिस्ता !


 

कैसे कहूँ मैं ये सब प्यार के प्रतीक हैं

और फिर कैसे कहूँ मैं

कि जीवन का बंधन

एक कच्चा धागा है ?


 

«««

नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी


 

बूँद


 

? डॉ. रवीन्द्र समीर


 

"दोस्त कुआँ, प्रचंड गर्मी है, मैं सूखी जा रही हूँ मुझे शरण दो, मेरी रक्षा करो।" बूँद ने कुएँ से बिनती की।

कुआँ बोला- "मेरे यहाँ तुम्हें शरण देने का सवाल ही पैदा नहीं होता। तुम जैसी छोटी, क्षणिक और मृत्यु-उन्मुख बूँद को मैं शरण देकर तुम्हारे अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर सकता।"

बूँद निराश व दुःखी होकर चली गई। गर्मी से भाप बनकर छोटी होने लगी। कुछ देर सोचने के बाद..... बूँद दूसरे बूँदो को समेटने में लग गई। फिर क्या था ... जो बूँदें अनाथ थीं, विधवा थीं, बेसहारा थीं, मृत्युश्या में थीं...सब एकाकार होने लगीं। उनको भी सहारा मिला। देखते देखते सौ, हजार, लाख, करोड़ बूँदें मिलती गईं... फिर नदी, फिर बाढ़..।

दूसरे दिन सबेरे लोगों ने देखा...चारों ओर पानी ही पानी था। कुआँ ! उसका तो अवशेष भी न बचा था।


 

«««

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी।

0 comments: