मैं एक नदी बहना चाहता हूँ मैं नहीं चाहता कि एक तालाब बनूँ ज़िंदगीभर मैं नहीं चाहता कि आदिम काई पालकर पोखर बनकर जमा रहूँ ज़िंदगीभर दूषित बनूँ दुर्गंधित बनूँ निश्चित सीमा भीतर रहूँ निश्चित आयतन में रमा रहूँ मैं नहीं चाहता कि मैं गतिहीन कुँवा बनूँ कुँवे का अचल पानी बनूँ उठाया जाऊँ अदृश्य हाथों से वाष्पीकृत हो जाऊँ और ज़िंदगी खत्म करूँ। मैं नदी बनना चाहता हूँ हर दिन ज़िंदगी के किनारों को बदलना चाहता हूँ ज़िंदगीभर यात्रा चाहता हूँ यात्राभर ज़िंदगी चाहता हूँ मुझे स्वीकार्य नहीं जीने की ये जड़ परंपराएँ। अनिश्चित ही सही मैं नदी बनना चाहता हूँ मैं नदी बहना चाहता हूँ। ¬¬ मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी नपुंसक ? दुर्भाग्य ! मेरा मेरे बाहर ऐसा 'क्या यह 'खिडकी मैं पहले वह 'इसका 'यह 'लीजिए, 'पैदल 'घंटेभर में आ जाऊँगा।' 'और टैक्सी 'लौटते 'उस अब 'गहने 'नहीं, 'ये 'जरूरत मैं दोपहर 'इस 'हाँ, 'आपके 'हाँ, 'नीचे वह 'और 'ऐसा 'क्यों भला 'यहाँ 'यह 'असली 'कहिए।' 'पहले ¬ हमलोग 'असली 'मैं हम 'कमरे 'और 'किराया 'दूसरों 'ऐसा 'सच ! मेहमान 'इस 'आप 'इस 'गज़ब अभी तक 'आप करते क्या हैं?' 'मैं वकील हूँ।' 'सरकारी वकील?' 'नहीं, मैं व्यावसायिक वकील हूँ।' 'तो आपका अपना लॉ फॉर्म है?' 'नहीं हमारा संयुक्त लॉ फॉर्म है।' 'अकेले रहते हैं?' 'मेरा परिवार है, उन्हीं के साथ रहता हूँ।' 'कितने सदस्य हैं परिवार में?' 'पत्नी और बच्चे हैं।' 'बच्चे कितने हैं?' 'पाँच लड़कियाँ।' 'पाँच लड़कियाँ?' 'हाँ !' 'अब भी बेटे की आस सजाए हैं?' 'यह तो नितांत व्यक्तिगत प्रश्न पूछा आपने। मगर मैं रूठूंगा नहीं। आपने ठीक ही कहा है।' मैं पहले ही कह चूका हूँ उसकी तार्किक क्षमता मुझे अच्छी लग रही है। उसे मेरे यहाँ रहना होगा। छत्ता बढा है उसका। उसे मेरे बंजर जमीन पर खाद पानी देना ही होगा। ¬ 'आदमी तो ठीक लगता है। पर बच्चे कितने? बीवी फिर पेट से है।' मेरी पत्नी का चेहरा बुझा हुआ है। 'फिक्र करने की जरूरत नहीं यह आदमी ज्यादा दिन नहीं टिकने वाला।' मैंने हिम्मत बंधाई। 'क्यों?' उसकी आँखें सवाल करती हैं। हमारे यहाँ ठहरनेवाला आदमी कम से कम एक दशक तो ठहरा ही है। इसका भी रिकार्ड है। 'क्योंकि यह वकील है।' 'वकील एक मकान में लंबे समय तक नहीं ठहरते क्या?' 'देखो मेरी जान ! मुल्क में भ्रष्ट मंत्री और स्मगलर काफी हैं। उनमें से बहुतों के मुकदमे होंगे। दो चार ऐसे मुकदमे हाथ लग गये तो यह आदमी मालामाल हो जाएगा। और फिर अपना मकान बनवाएगा और चला जाएगा।' पत्नीको विश्वास करने की वजह मिल गई थी। उसे मालूम था हम जिस शहर में बसे हैं उसका अस्तित्व ही इन्ही तीन किस्म के लोगों में टिका है। वह एक बरस तक नहीं गया। मैंने सोचा, उसे आशातीत मुकदमे नहीं मिले। फिर एक बच्ची बढ़ गई उसके परिवार में। 'दूसरे साल तो चला ही जाएगा' हमने सोचा। वह नहीं गया। तीसरे साल भी वह टिका रहा। हम उसकी वकालती पर शक करने लगे। 'अब हम आपका मकान छोड़ रहे हैं।' चौथे साल उसने ऐलान किया। 'बधाई हो ! दूसरों को यह मकान छोड़कर अपना मकान बनवाने में दश बरस लगे। लेकिन आपने तो तीन बरस में ही यह कारनामा कर दिखाया।' 'आपका अंदेशा गलत है। मैं अपना नया मकान बनाकर नहीं जा रहा। मैं तो अपने पुस्तैनी मकान में जा रहा हूँ।' 'पहाड़ में?' 'हाँ !' 'आपने मेरे अंदेशे को गलत ठहराया। कोई भी आदमी इस शहर में आने के बाद लौटकर नहीं गया है, बल्कि कई तो विदेश गए हैं। अमरिका व जापान की तरफ गए हैं।' मैंने उसे इस शहर का तीन सौ बरस का इतिहास स्मरण कराया। 'मैं अलग रास्ते पर चलना चाहता हूँ।' 'बताइए कौन सा अलग रास्ता?' 'वह मैं अभी नहीं बताऊँगा। बताने का कोई अर्थ नहीं है। मैं अपने गाँव लौट रहा हूँ।' 'नहीं माड़साहब ! मुझे तो आपकी योजना बिलकुल पसंद नहीं आई। आपलोगों के लिए यह शहर स्वर्ग है। एक स्मगलर नहीं तो एक भ्रष्ट मंत्री का मुकदमा आपको मिल जाए तो, ज़िंदगी भर के लिए काफी है। ऐसी जगह छोड़ के माड़साहब भी.........।' 'रूपये कमाने, मकान बनवाने और मौजमस्ति करने के अलावा और भी बहुत काम हैं इस संसार में। तरस आता है मुझे आपकी बुद्धि पर।' उसने मेरी बोलती बन्द कर दी। वह अपने इरादे में खरा उतरा। अपने बीवी बच्चों के साथ एक दिन सबेरे ही मेरा कमरा खाली कर दिया। उसकी बीवी के आँखों में आँसू थे। बच्चियों के भी आँखे नम थीं। मेरी पत्नी भी अपने को संभाल नहीं पाई। सब भावनाओं मे बहे जा रहे थे। 'आप मेरे मकान आएँ। मेरी योजना क्या है अपनी आँखों से देखें।' उसने कहा। यह निमंत्रण सिर्फ औपचारिकता नहीं थी। वह ही नहीं बल्कि उसके परिवार के अन्य सदस्य भी हमारे यहाँ बारबार फोन करते। उसने पूछना नहीं छोड़ा - आप कब आएँगे?' तीन बरस बीत गए। उसके बारबार के आग्रह के सामने खड़ा हूँ मैं। ज़िंदगी बिना काम के ही बीत रही है। पर्यटक बनने का साहस नहीं है। शहर छोड़कर कहीं गया हूँ कभी। इसबार जाने की तारिख का ही ऐलान कर दिया मैंने। उसने मुझे पता दिया था। उसके बाल-बच्चे और बीबी के लिए उपहार खरीदे। प्लेन से जाने से व़क्त तो कम लगता पर मैं कुछ पैसों की बचत करना चाह रहा था। प्राकृतिक सुंदरता पान करने के लिए अच्छा मौका था। थानकोट पार करने तुरंत बाद ही मुझे साफ हवा मिली और मैं आनंदित अनुभव करने लगा। ¬ मेरे लिए उसने एक अलग कमरे की व्यवस्था की। उसके रसोई में मैं खाना खा लेता। सुबह तड़के ही वह मुझे जगाने आ जाता। दो घंटे त हम तक साथ टहलते। उसके बाद वह अपने काम में लग जाता, जो पुराना ही काम था। यहाँ उसने थोड़ा सा परिवर्तन किया था। गरिबों के मुकदमे वह मुफ़्त में देखता था। इसीलिए उसके ऑफिस में भीड़ लगी रहती थी। हर दिन हाथ जोड़कर रोते हुए लोग मिल जाते। पैसेवालों से वह अच्छी फीस लेता था। जिले में वह काफी लोकप्रिय हो गया था। 'इनमें से पच्चीस फीसदी लोगों को न्याय दिला सका तो यह मेरी सफलता होगी।' उसने कहा। जिला मुख्यालय में भी उसने मकान नहीं बनवाया था। उसका पुस्तैनी मकान वहाँ से बहुत दूर था। 'मेरी संपत्ति तो ये हैं।' गरिबों की भीड़ दिखाते हुए उसने कहा। 'मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस् मैं इन लोगों को न्याय दिलवा सकूँ।' वह कहता था। मैंने उसकी सपने की दूनिया देखी। उसके नये सिद्धांत के मायने देखे। उसके आदर्शका रूप देखा। उसका यह रूप मेरे मकान में रहते व़क्त कभी दिखाई नहीं दिया था। मैं यहाँ तकररीबन एक महिना बिता चुका हूँ। सबेरे ही मैं उसके साथ सैर के लिए निकला हूँ। मकान से कुछ ही दूरी तय कर पाए हैँ कि एक आदमी सामने से आता हुआ दिखाई देता है। वह पास आकर उसे गोली मारता है। कई राउंड फायरिंग करता है। वह गिर जाता है। मैं चिल्ला उठता हूँ और उसे पकड़ने लगता हूँ। कई लोग जमा होते हैँ। वह मर गया है। लाश उठवाने और उसकी बीबी को आशौच मे रखने की तैयारियाँ हो रही हैँ। सब रो रहे हैँ। मेरी भी आँखें भीग गई हैं। गरीब लोग एक दूसरे की तरफ देख रहे हैं और आँसूओँ की नदियाँ बह रही हैं। दूसरे दिन ही मैंने उसका मकान छोड़ दिया। वह अलग किस्म की जीवनशैली अपनाने के लिए गाँव लौटा था। उसका अंत भी अलग किस्म से हो गया। मेरे मकान ¬¬ नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी रिश्ता ? डॉ. रवीन्द्र समीर वह मुझे अपनी सुख-दुःख की कहानियाँ सुनाया करता है। मैं भी मेरे हर पल उसी पर न्यौछावर करती हूँ। घर परिवार गुप्त बातें, पति-पत्नी के अंतरंग संबंध की बातें भी हम एक दूसरे के सामने रखते हैं क्योंकि हमारे बीच कोई रिश्ता नहीं है। ¬¬ नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
? भूपिन व्याकुल
ध्रुब
सापकोटा
बहुत
दिनों
से
मेरा
मकान
खाली
पड़ा है।
मेरी
आमदनी
का
जरिया, जीवन
निर्वाह
का
स्रोत
!
कुछेक
साल पहले
तक
मैं
इसको
ज्यादा
महत्त्व
नहीं
देता
था।
यह
मेरी
अतिरिक्त
आमदनी
थी।
प्रमुखता
पगार
की
थी।
मेरा
ऑफिस
समृद्ध
था।
देखते-देखते
ऑफिस
दिवालिया
हो
गया।
मुझे
अनिवार्य
अवकाश
देते
वक़्त
तक
तो
ऑफिस
की
पेंसन
देने
की
क्षमता
बरकरार
थी।
मेरे
रिटायमेंट को
भी
पाँच
बरस
हो
चुके
हैं।
पहले
पहले
तो
मैं
यथासमय
पेंसन
आया
करता
था।
अब
तो
अनियमितता
ने
जगह
बना
ली
है।
सुनता
हूँ
पेंसन
की
व्यवस्था
ही
समाप्त
करने
की
प्रक्रिया
चल
रही
है।
मकान
दूमन्जिला
है।
एक
में
मैं
रहता
हूँ
और
दूसरा
किराए
के
लिए
है।
मकान
में
किराए
रहनेवाले
लोग, अपना
मकान
बनवाकर
ही
जाते
हैं।
मैं
हर
नए आनेवाले को
सुनाता
हूँ।
एक
आकर्षण
पेश
करता
हूँ।
मेरी
यह
शैली
अब
तक
तो
काम
कर
रही
थी।
कमरा कभी
खाली
रहता
था।
पर
इसबार
वह
कमरा
खाली
पड़ा है।
मेरा
वह
आकर्षक विज्ञापन
डैट एक्सपायर्ड
दवा
की
तरह
हो
जया
है।
लिख
देते
है 'कमरा
किराए
पर',
धर्मपत्नीका
सुझाव
है। लेकिन मुझे
उसके
प्रस्ताव
पर
भरोसा
नहीं
है।
नहीं
है
की
लोग
आते
ही
नहीं
थे।
कभी
कभार
आ
टपकते
थे।
उन्हें उकसाने
के
लिए
मैं
कह
उठता
यहाँ
से
जानेवाले
लोग
इससे
सुंदर
व
बढ़िया
मकान
बनवाकर
गए
हैं।
जब
यह
नारा
भी
बेकाम
हो
चला
तो
धर्मपत्नी
ने
बोर्ड
लटकाने
का
सुझाव
दिया।
मैंने
तो
लोगों
को
सच्ची
बातें
ही
सुनाई
थी।
वे
विश्वास
क्यों नहीं
करते - मैं
क्या
करु
?
तरकीब
रंग
लाएगी ?'
मैं
उससे
पूछता
हूँ।
दूसरा
विकल्प
न
देखकर
ही
मैंने
यह
सवाल
किया
है उससे।
में
एक और दूसरा
दीवार
में
लटका
देते
हैं'
वह
कह
उठती
है।
कागज
खरीदता लाता
हूँ।
लाल स्याही और
कलम
लेता
हूँ।
मेरी
हस्तलिपि
अच्छी
नहीं
है। जबतक
नौकरी
की
अच्छी हस्ततिपि
की
जरुरत
कभी
नहीं
पड़ी।
नौकरी
छूटने
पर
लिखाइ
का
काम
पूरी
तरह
ठप
हो
गया।
मैंने ही
नेपाली
में
लिखा
और
कागज को
खिडकी
में
चिपका
दिया।
गोंद
नहीं
था, पके चावल
से
काम
लिया।
दूसरा
कागज
दीवार
पर
चिपका
दिया।
सड़क
पर
पहुँच
कर
अपने
लिखे
हुए
कागज
को
आगंतुक
की
तरह
देखने
लगा।
मैं
फिर
कमरे
में
लौट
आया।
तीसरा
कागज
अंग्रेजी
में
तैयार
किया
और
उसे
भी
दीवार
में
पहले
कागज
के
बगल
में
चिपका
दिया।
अंत
में
धर्मपत्नी को
बुलाया
दिखाने के लिए।
कहने
लगी
'विदेशी
तो
आने
से
रहे।
बेकार
में
स्याही
और
कागज
जाया
किया।'
एक
मनोवैज्ञानिक
कारण
तो
है।
यह
मकान
किसी
ऐरेगैरे
का
नहीं
है।
आधुनिक
लोगों
का
है।'
मैं
कह
उठा
और
वह
हँसने
लगी।
वह
भी
अपने
को 'ऐरेगैरे' में
शामिल
करने
को
तैयार
नहीं
है।
हमारा
मकान
पुराना
ही
सही
लेकिन
है
बहुत
महत्त्वपूर्ण'
इस
बात
को
दर्शाने
के
लिए
हम
ने
कोई
कसर
बाकी
नहीं
छोड़ी
थी।
किराए
पर
देने
के
लिए
नियम
बनाए
थे।
जैसे
नौकरीसुदा
हो, सपरिवार
हो
और
किसी
का
सिफ़ारिश
लेकर
आए।
पर
यह
मकान
बहुत
दिनों
से
खाली
पड़ा
है।
हमारे
बनाये
नियम
हम
ही
तोड़ने
के
लिए
तैयार
हैं।
सिर्फ आदमी
चाहिए- जो
किराए
पर
लें।
अब
सिर्फ यही
एक नियम
बचा
है।
इन्हें
बेच
दें।'
पत्नी
अलमारी
से
गहने
निकाल
कर
देती
है।
मैं
सोने
के
गहने
ले
लेता
हूँ।
यह
बड़े
संकट
का
सूचक
है।
जाइएगा।'
वह
कहती
है।
मैं
कहता
हूँ।
क्या
काम
है ?'
पत्नी
कहती
है।
'बस
में
गहने
चारी
हो
सकते
हैं।'
वह
मुझे
हिदायत देती है।
के
लिए
पैसे
मांगने
कि
हिम्मत
मुझमें
नहीं
है।
हमारी
क्षमता
बॉयबॉय
कर
चुकी
है।
वक़्त
टैक्सी
लेलें।'
वह
कहती है।
उसे
फिक्र
है
मैं
ज्यादा
थक
न
जाऊँ।
वक़्त
तो
मैं
पैसेवाला
बन
जाऊँगा
तुम्हें
कहने
की
जरूरत
ही
नहीं
है।'
मैं
कहता
हूँ।
मैं
सड़क
पर
हूँ।
सड़क
में
लोगों
की
भीड़
है।
मैं
उसी
भीड़
का
हिस्सा
बन
जाता
हूँ।
ज़िंदगी
भर
मैं
इसी
भीड़
का
हिस्सा
तो
था।
अब
इस
जीवन
के
उत्तरार्द्ध
में
कौन सी तबदीली
होगी ?
इस
भीड़
में
कोई
अंदाजा
नहीं
लगा
सकता
हाथ-मुँह
जोड़ने
के
लिए
कोई
गहने
बेचने
चला
है।
कोई
अनुमान
ही
नहीं
कर
पाएगा
जीवन
भर
नौकरी
करनेवाला
आदमी
हाथ-मुँह
जोड़ने
की
समस्या
से
परेशान
है।
गिरवी
रखने
है ?'
दूकानदार
पूछता
है।
बेचने
हैं।'
मैं
कहता
हूँ।
गहने
तो
बहुत
अच्छे
हैं।'
वह
फिर
कहता
है।
होगी
तो
फिर
बनवा
लूँगा।
मैं
जवाब
देता
हूँ।
रुपये
लेता
हूँ।
मैं
अब
धनी
बन गया
हूँ।
बहुत
दिनों
से
मैंने
होटल
में
नहीं
खाया
है।
मैं
होटल में चला
जाता
हूँ
और
नास्ता
करता
हूँ।
अखबार
पढ़े
भी
महिनों
बीत
गए, पत्रिकाएँ
खरीदता
हूँ।
सड़क
मे
प्रतिगमन
विरुद्ध
जुलूस
निकला
हुआ
है।
टैक्सी
मिलने
की
संभावना
कम
है।
मैं
पैदल
ही
घर लौटता हूँ।
उस
रात
मुझे
चैन
की
नींद
आती
है।
का
समय
होगा।
मैं
कमरे
में
ही
पड़ा
हूँ।
घरवाली
ने
चाय
बनाकर
दी
है।
कालबेल
बजाता
है
कोई।
बाहर
निकलने
पर
देखता
हूँ
अपरिचित
अधेड़
है
सामने।
मकान
के
मालिक
आप
ही
हैं
?'
वह
पूछता
है।
मैं
ही
हूँ।'
मैं
जवाब
देता
हूँ।
मकान
में
कमरा
किराए
पर
है?'
वह
फिर
पूछता
है।
हैं।'
मैं
कहता
हूँ।
या
ऊपर ?'
वह
पूछता
है।
लगता
है
विज्ञापन से
यह
बात
स्पष्ट
नहीं हो पाई।
कमरे
देखता
है।
खिड़कियाँ
देखता
है।
उन्हें
खोलता
है, बंद
करता
है।
बिजली
के
स्वीच
टटोलता
है।
फिर
वह
दरवाजे
खोलता
है
और
बन्द
करता
है।
सब
तो
ठीक
है।
टॉयलेट और स्नानागार नीचे
हैं।
बरसात में
या
रातको
नीचे-ऊपर
करना तकलीफ
देह
है।'
वह
बोलता
है।
मैंने
जानबूझकर
बनवाया
है।'
?'
पानी
की
किल्लत
तो
आपको
मालूम ही
है।
सफ़ाई
व
स्वास्थ्य
की
दृष्टि
से
कमरे
से
दूर
बनाया
है।'
तो
कोई
बात
नहीं
हुई।
साफ
करने
से
तो
सफ़ाई हो
ही
जाती।
शायद
कुछ और
ही
वजह
हो?'
आदमी
तार्किक
लगता
है
और
स्पष्टवक्ता
भी।
वजह
जानना
चाहते
हैं?
कमरे
देख
लें।'
नीचे
उतरते
हैं।
मैंने
एक
कमरे
को
बैठक
बनाया
है।
उसी
कमरे
में
हम
लोग
बैठ
जाते
हैं।
पत्नी
चाय
ले
आती
है।
यह
स्थिति
हमारे
लिए
बिलकुल
नई
थी।
पहले
कभी
हमने
कमरा
देखने
आए
लोगों
को
चाय
से
स्वागत
नहीं
किया
था।
आज
हम
उन्हें
सम्मान
करने
की
अवस्था
तक
पहुँच
गए
हैं।
यह
एक
तरफ
से
अच्छा
भी
है, क्योंकि
इससे
हमारे
बीच
की
दूरियाँ
मिट
गई
हैं।
वजह
सुनेगें ? जिसके
मकान
में
जाने
के
लिए
गाड़ी
का
रास्ता
नहीं
है
उस मकान का मालिक
नहीं कहता की
गाड़ी
का
रास्ता
नहीं
है बल्कि यह
कहता
है
कि प्रदूषण
से
बचने
के
लिए
मैंने
मकान
दूर
बनाया
है।
यह
सौचालय
और
स्नानागार
की
बात
भी
बिलकुल
वैसी
ही
है।'
समझ
गया।
और
व्याख्या
की
जरुरत
नहीं
है।'
वह
कहता
है।
चाय
पी
रहे
हैं।
वह
आदमी
कमरा
लेगा
या
नहीं
यह
बात
स्पष्ट
नहीं
हो
पाई
है।
का
किराया?'
वह
पूछता
है।
मैंने
किराया
पहले
के
मुकाबले
कम
बताया है
और
इस
बात को
पत्नी
से
छिपाइ
भी है।
क्या-क्या
शर्तें हैं
?' उसने
फिर
पूछा।
मुझे
लगा मेरे किराए की बात उसे भा गई है।
एडवांस
और
बिजली
पानी का
अलग।'
के
मुकाबले
आपकी
शर्तें आकर्षक
हैं।'
क्या ?'
नहीं
आ
सकते।
मकान
का
टेलिफोन
इस्तेमाल
नहीं
कर
सकते।
रात
दस
बजे
के
बाद
मकान
में
नहीं
ढूकना।
ऐसी
शर्तें भी
होती
हैं।
मैं
तो
भुक्तभोगी
हूँ, बहुत
मकानों
में
किराए
पर
रह
चुका
हूँ।'
मामले
में
मेरा
कोई
सिद्धांत
नहीं
है।'
मैं
उदार
बनता
हूँ।
यह
आदमी
कमरा
ले
ले
यही
मेरी
इच्छा
है।
मैं नहीं चाहता यह लौट जाए।
अपने
मकान
की
क्या
विशेषता
देखते
हैं?'
कमरे
में
रहनेवाले
लोग
अपना
मकान
बनाकर
ही
यहाँ
से
निकले
हैं।
यह
अब
तक
का
रिकार्ड
है।'
की
बात
है।'
उस
आदमी
ने
कमरा
लेने
की
बात
कही नहीं
है।
आशंकाओं
के
बादल
मेरे
भीतर
उमड़
रहे
हैं।
मेरी
की
उदारता
काम
कर
रही
है
या
नहीं
यह
देखना
है।
उसका
परिचय
लेने
का
कोई
अर्थ
नहीं
है
क्योंकि
वह
निश्चिय
नहीं
कर
पा
रहा
है।
जीवन में सदा सार्थक काम तो होते नहीँ।
का रिकार्ड भी टूट गया। अब मैं कुछ नहीं बोलनेवाला। क्या मैं नपुंसक ही हूँ?
Saturday, October 3, 2009
अंक छब्बीस से
Posted by कुमुद अधिकारी at 7:32 PM 0 comments
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